दिवाली की रात

दिवाली की रात थी
वह रात भी कुछ खास थी
अंधेरे के आगोश में
रोशनी भी लड़ने को तैयार थी
असत्य की हार की भांति
अंधेरे की हार थी
दीपों से रोशन वह रात
वह रात भी कुछ खास थी || १||
गुजरा मैं भी उस राह,उस मोड़ से
जहां जिंदगी रोती है अपनी हालात पर,
एक छोटी सुंदर बाला वहां खड़ी थी
कुछ परेशान जान पड़ी थी
तन पर ना था वसन भली-भांति
चेहरे की लकीरें थी दिखलाती
जठराग्नि थी उसे जलाती
भूख शांत करने की आस में
सर्द रात में कहीं शरण की फिराक में
इस रात्रि में भी कुछ पाने के प्रयास से
हालातों की हार थी
जिजीविषा की जीत थी
दीपों से रोशन वह रात
वह रात भी कुछ खास थी || २||
कुछ कदम चला था मैं
पास के मोहल्ले में
सुहाना मंजर था
खुशियों से भरी हर पथ, हर डगर
दीपों कि अवली से रोशन मंजिले थी
शाही अंदाज बयां करने को
आतिशबाजी में बढ़े चढ़े
पैसों की फिकर किसे थी
शानो -शौकत की जो बात अड़े
महफिलों के दौर चले
पटाखों का शोर मचे
वह पैसों से रंगी रात थी
पैसों की जीत थी
दीपों से रोशन वह रात,
वह रात भी कुछ खास थी ||३||
एकांत था फिर भी अविराम था
दो दृश्य का मानस पटल पर अजीब मंचन था
अमीरी और गरीबी का यह द्वंद था
उस बाला के मुख मंडल में इक चित्कार थी,
अमीरी की आतिशबाजी से वह कहीं गुम थी
अंतर्मन की गुत्थी में उलझता जा रहा था मैं
क्यों फासले अमीरी गरीबी के
दरमियां एक ही समाज के
इस उलझन में पूछा मैंने ईश्वर से
क्यों अनसुनी कर दी तूने
गरीबी की चित्कार यह
कहीं दर्द है कहीं सुकून है
कहीं गरीब है कहीं अमीर है
यदि समझे हम अपने धन को
ना वस्तु संग्रहण की अपितु
है माध्यम मात्र दान का
तो देखना मिट जाएगा फासला अमीरी गरीबी का
उदय होगा सोने का सूरज
ईश्वर की यही मात्र सीख थी
मेरी उलझन की हार थी
मंथन की जीत थी
दीपों से रोशन वह रात
वह रात भी कुछ खास थी|| ४||

-डॉ भावनेश पंचाल

‌A poem written in 2009 by Dr Bhavnesh Panchal

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