यात्रा के बस, कुछ अंतिम क्रम
क्यों पथ विचलित हुए विक्रम।
दशकों का शोध, और नियमित श्रम,
और देख कर तुम्हारा अद्भुत परिक्रम,
निश्चिंत था पंचाल, रंग लाया परिश्रम।
जब शेष समय था, बहुत ही कम,
बस उसी समय का यह है गम,
क्या कारण था बस यही है भ्रम।
यात्रा के बस कुछ अंतिम क्रम
क्यों पथ विचलित हुए विक्रम ।। 1।।
लाखों मीलों की दूरी भी,
रोक न पायी तेरे कदम।
क्योंकि प्रेयसी से मिलकर ही,
सच्चे प्रेमी लेते दम।
चांद का चेहरा था बस मन में,
दुरिया भी लगती थी कम
अभिभूत था देख के चाल,
निडर हो चल दिए दिए विक्रम।
यात्रा के बस, कुछ अंतिम क्रम
क्यों पथ विचलित हुए विक्रम ।। 2।।
एक मील था बस शेष,
प्रेयसी और उसके सौंदर्य के,
मन में अवशेष।
चांद ही थी प्रेयसी
चांदनी का वेश।
स्वयं आंखों से देख,
चांद की इक मुस्कान।
भूल गये सब कुछ,
टूटा संपर्क,
ना रहा कोई भान।
धीरे-धीरे
धैर्य ने भी तोड़ दिया दम,
पथ-विचलन के लिए
क्या यह था कम?
यात्रा के बस, कुछ अंतिम क्रम
पथ विचलित हुए विक्रम ।।3 ।।
चांद-विक्रम की गाथाएं,
अब यहां गाई जाएगी
त्याग-बलिदान के बिना,
कैसे अमर हो पाएगी।
लेकर फिर पुनर्जन्म विक्रम,
तुझसे मिलने आएगा,
सच्चा आशिक जो है
और कहां जाएगा।
वाकिफ भी होगा अब तो,
और अधिक होगा श्रम।
यात्रा के बस, कुछ अंतिम क्रम,
मत पथ-विचलित होना विक्रम।। 4।।
– डॉ भावनेश पंचाल भूधर