लफ्जों की दरकार किसे मेरी खामोशी ही काफी है , तुमसे बात करने को है गुप अंधेरा चारों ओर दूर तलक, बंद आंखें ही काफी है तेरा चेहरा देखने को, दूर हो या पास तु मेरे, तेरा साथ हो या ना, यादें काफी है तेरा एहसास करने को बारिश का भीगापन या सर्दियों की धूप, यादों के मौसम ही काफी है तुझे महसूस करने को मान लिया है तुझे अपना क्या फर्क है तू माने या ना तेरा नाम ही काफी है तमाम उम्र जीने को
हिंदी कविता को समर्पित यह ब्लॉग संग्रह हैं मेरी कविताओ का ,यह मेरा सौभाग्य हैं की मेरा माध्यमिक शिक्षण हिंदी में हुआ | वायु एवं आकाश अभियंत्रिकी में पीएचडी अर्जित की |
शिक्षण के दौरान मातृभाषा के प्रति प्यार दिनों दिन बढता रहा | उसी का नतीजा ये ब्लॉग हैं-मातृभाषा को समर्पित ये मेरा छोटा-सा प्रयास
-डॉ भावनेश पंचाल
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