ख़ामोशी का हैं आलम , कुछ न कह पा रहा हूँ
बस लिखे जा रहा हूँ एक दास्ताँ
छुपा रखा था इसे दिल के इक कोने में
आज अपनी कलम से बतियाये जा रहा हूँ
झाक रहा हूँ अतीत के झरोखो में
कुछ यादें जाहिर किये जा रहा हूँ
वो पहला दिन ,अंजान शहर
न कोई पहचान
बस पहचान थी
मुझे अपने आप की
कुछ कर गुजरने की तमन्ना
आगे बढ़ने की सोच ही,
तभी तो मैं गाव से शहर खीच आया था
कुछ दिनों में न जाने क्यों
यह शहर लगा अपना
जाना पहचाना
कुछ यार दोस्त
उन दोस्तों में न जाने क्यों
वो चेहरा खास था
वो न था केवल यार
किन्तु था मेरा पहला प्यार
वे आँखे जिनकी गहराई कभी ना झाक सका मैं
उस मृगनयनी का प्यार न पा सका मैं
उस मुख मंडल की काँति
मनो प्रत्युष की किरने बिखेरती
मुझे झकझोर करती
ठहरे पानी में हलचल सी
उसकी वो मुस्कान
जैसे चाँद हो पूरा फलक पे चाँदनी बिखेरता
तारो से भरी रात में चाँद सा कुछ खास
वो चेहरा न जाने क्यों
भीड़ में भी अपना मुकाम बना लेता था
अपने प्रभाव में मुझे ला देता था
समझ ना पाया मासूम चेहरे से ढ़के
उस शख्स को
काश दिल भी मासूम होता
बस यही इक आह थी
मैं न था वो जिसकी उसे चाह थी
कृष्ण मेघ से उसके, रेशमी बाल
हमेशा गुथे ही रखती थी
उन लटो को न कभी बिखरने दिया
कितनी कातिल होती वो अदा
जब जुल्फे बिखेर के चेहरे पे आती
कभी देख न पाया वो अदा
क्योकि सादगी ही था श्रृंगार सदा
ना तो वो कुछ कहती
न इज़हार करती आँखे
बस वो शांत ,चुपचाप
सहमी सी
हैं वो इक बेमिसाल नूर
मानो कोई जन्नत की हूर
छाया हैं मुझपे भी
उसका सुरूर
ये दिल उससे
कुछ कहना चाहता था जरुर
पर उसे खोने के डर से
ना कुछ कह पाया
न कर पाया उससे वो बात
आज तक न समझी मेरे ज़ज्बात
दूरियाँ बढती गयी
छोड़ दिया उसका शहर
वो गली वो डगर
लेकिन आज भी वो याद हैं
हर शाम हर सहर
यादे रह गयी
प्यार की कश्ती बह गयी
हां किनारा जरुर मिला था
दोस्ती का ,यारी का
थी वो अब सिर्फ मेरी दोस्त
इक शाम बैठा था मैं
अपने यारो के बीच
किसी ने कहा
कर दे इज़हार, हिम्मत न हार
उसके ना कहने का मुझे था अंदेशा
दिल पे पत्थर रख के फिर भी मैंने कर दिया
इक संदेशा
पढ़ के जिसे मुँह मोड़ दिया उसने
गम से रिश्ता हमारा जोड़ दिया उसने
सावन के बाद पतझड़ तो आना था
अब तो एक दोस्त भी खो चूका था मैं
प्यार में हार के बहुत रो चूका था मैं
ना जाने कितनी बार कहा हमने
कर दो माफ़ हमें
तब कही बात हुई एक नयी शुरुआत हुई
फिर मिल गया इक दोस्त
बस दोस्ती का अहसास ही था
जो किया महसूस मैंने भी
जब दिया खुदा ने
फिर से तोहफे में
वाही इक दोस्त
बस तू
स्वयं को पाया तुझमे
ना खोया बस पाया
इक आनंद तेरी दोस्ती का
हैं ख्वाहिश और न कुछ पाने की
बस बरकरार रखना
यारी अपनी
संग चलना ,छाव बनना
देखना फिर खिलेगी जिन्दगी की फुलवारी अपनी
नहीं चाहता खोना मैं
यह दोस्त
बदल लूँगा स्वयं को कुछ इस तरह
चाहे वो जिस तरह
हमेशा छुपाये रखूँगा
बस इक ख़ामोशी , बस दोस्ती
अब दोस्ती से ही जिन्दगी गुजार दूंगा
उसे कम से कम अपने पास तो पा लूँगा
रोकूंगा अपनेआप को , न करूँगा उजागर
कभी मेरा प्यार
बस हैं दुआ खुश रहे मेरा यार
कलम रुक गयी
कुछ और क्या लिखू
कल को तो न मैंने देखा हैं न उसने
बस छोड़ता हूँ फैसला उसपे
क्या ये कोरे कागज़
दोस्ती या प्यार के शब्दों से भर पाएंगे
ये जानती हो सिर्फ तुम
अलविदा हैं पंचाल का, रुखसत
खुदा जाने ……………………..
अब क्या लिखूंगा अगले कागज़ पे || ||